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आचार्य श्रीराम शर्मा >> ब्रह्मवर्चस् साधना की ध्यान-धारणा

ब्रह्मवर्चस् साधना की ध्यान-धारणा

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4270
आईएसबीएन :0000

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ब्रह्मवर्चस् की ध्यान धारणा....

२. सविता अवतरण का ध्यान

आनंदमय कोश यों तो अपने स्थूल शरीर में ही समाया हुआ एक दिव्य शरीर है, पर उसे पकड़ना, प्रभावित करना हो तो उसके केंद्र स्थान सहस्रार चक्र से संबंध मिलाना होगा। सहस्रार चक्र मस्तिष्क के मध्य भाग में माना गया है, उसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं।

पृथ्वी के उत्तर ध्रुव पर अंतर्ग्रही शक्तियों का अवतरण होता है। उसी अनुदान पर पृथ्वी अपनी महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं का एक बड़ा भाग पूरा करती है। मनुष्य भी पृथ्वी के समान ही एक पूरा ग्रह है। उसका मस्तिष्कीय मध्य केंद्र ब्रह्मरंध्र उसी प्रकार है जैसे पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव प्रदेश का वह केंद्र जिसे धुरी कहा जाता है और उससे पृथ्वी की भ्रमणशीलता का सारा संतुलन बना हुआ है। मस्तिष्क का मध्य बिंदु सहस्रार है। इसी स्थल के साथ ब्रह्मसत्ता के साथ उसका संबंध जुड़ता है। नाभिनाल से माता और भ्रूण का संबंध जुड़ता है, ठीक इसी प्रकार ब्रह्मसत्ता और आत्मसत्ता के बीच का आदान-प्रदान इसी ब्रह्मरंध्र के मध्यवर्ती सहस्रार घटक पर निर्भर रहता है।

पुराणों में ब्रह्मलोक, विष्णुलोक और रुद्रलोक का बड़ा आकर्षक एवं विचित्र वर्णन है। अनंत जलराशि, सहस्त्र दल कमल पुष्प, उस पर ब्रह्मा जी की तप-साधना का स्थान,यही है ब्रह्मलोक। सहस्र फन वाले शेष सर्प की शैया, विष्णु भगवान का शयन, यही है विष्णुलोक। कैलाश पर्वत, मानसरोवर, सर्प मालाओं का धारण शिवलोक। इन तीनों देवताओं के लोकों का वर्णन मस्तिष्क मध्य के सहस्रार चक्र के साथ ठीक प्रकार बैठ जाता है। मस्तिष्क में भरी हुई मज्जा को जलराशि, समद्र, मानसरोवर समझा जाना चाहिए। सहस्त्र फन वाला सर्प, सहस्र दल, कमल-शंकर के गले का सर्प महाकाल कुंडलिनी का महासर्प, इन आसनों पर विराजमान ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सद्गुरु आदि, यह सारा अलंकारिक चित्रण मस्तिष्क के मध्य भरे हुए गीले पदार्थ का, उसके मध्य सहस्रार बिंदु का और उसके साथ जुड़े हुए ब्राह्मी आदान-प्रदान का परिचय देता है। सहस्रार स्थल पर गढ़ी हुई कीर्ति ध्वजा शिखा है। जिसे हिन्दू धर्म में साक्षात् देव प्रतिमा के तुल्य पवित्र माना जाता है और मुंडन संस्कार के साथ समारोहपूर्वक प्रतिष्ठापित माना जाता है।

सविता शक्ति का आनंदमय कोश में प्रवेश करने का मार्ग यही सहस्रार चक्र है। अन्य चक्रों की तरह इसका स्वरूप भी शक्ति भँवर, समर्थ चक्रवात जैसा है। विशेषता के अनुरूप उसे सहस्र दल कमल कहा जाता है । सूर्य की हजारों किरणें, समुद्र की हजारों लहरें, ब्रह्म की हजारों आँखें एवं भुजाएँ प्रख्यात हैं। इस केंद्र से भी सहस्रों दिव्य धाराएँ विशिष्ट फुहारे की तरह छूटती है। इन सब तथ्यों का ध्यान रखते हुए उसे सहस्र दल कमल की संज्ञा दी गई है। सहस्रार का अर्थ है सहस्र आरे वाला। आरे में छोटे-छोटे दाँते होते हैं। इन्हें कमल पुष्प की पंखुरियों के समतुल्य माना गया है। आतिशबाजी की फुलझड़ी में जिस प्रकार एक साथ सहस्रों चिनगारियाँ छूटती हैं, उसी प्रकार इस सहस्रार से भी अगणित शक्ति प्रवाह छूटते हैं और आत्मसत्ता के विभिन्न केंद्रों को विभिन्न प्रकार से लाभान्वित करते हैं।

आनंदमय कोश की ध्यान-धारणा में सविता का सहस्रार मार्ग से प्रवेश करके समस्त कोश सत्ता पर छा जाने, ओत-प्रोत होने का ध्यान किया जाता है। यदि संकल्प में श्रद्धा, विश्वास की प्रखरता हो तो सहस्रार का चुंबकत्व सविता शक्ति को प्रचुर परिमाण में आकर्षित करने और धारण करने में सफल हो जाता है। इसकी अनुभूति कांति रूप में होती है। कांति सामान्यतया सौंदर्य मिश्रित प्रकाश को कहते हैं और किसी आकर्षक एवं प्रभावशाली चेहरे को कांतिवान कहते हैं, पर यहाँ शरीर की नहीं आत्मा की कांति का प्रसंग है, इसलिए वह तृप्ति, तुष्टि एवं शांति के रूप में देखी जाती है। तृप्ति अर्थात् संतोष। तुष्टि अर्थात् प्रसन्नता। शांति अर्थात् उद्वेग रहित, सस्थिर मनः स्थिति। यह तीनों वरदान, तीनों शरीरों में काम करने वाली चेतना के सुसंस्कृत उत्कृष्ट चिंतन का परिचय देती हैं। स्थूल शरीर संतुष्ट, तृप्त। सूक्ष्म शरीर प्रसन्न, तुष्ट। कारण शरीर शांत समाहित। यही वह स्थिति है जिसमें सहज मुस्कान बनी रहती है। हलकी-सी मस्ती छाई रहती है। कबीर ने इसी को सहज समाधि कहा है।

सहस्रार को अंतर्जगत का सविता माना गया है। प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य को सविता कहा गया है। ब्रह्मांड का सूर्य आकाश में चमकता है। जीव पिंड का सविता सहस्रार हैं उसे भी उदीयमान स्वर्णिम सूर्य की संज्ञा दी गई है। ब्रह्मांड की अपनी सीमा में जो कार्य सविता करता है, लगभग वैसा ही सहस्रार द्वारा आत्मसत्ता के पाँचों कोशों, छहों चक्रों तथा अन्य स्थूल-सूक्ष्म अवयवों में संपन्न किया जाता है।

आनंदमय कोश की जागृति में आत्मबोध,तत्त्वबोध, ब्रह्मबोध का त्रिविध उब्दोधन समन्वित है। सविता का दिव्य प्रकाश इन त्रिविध अनुदानों से साधकों को लाभान्वित कर सके, इसी के लिए यह ध्यान-धारणा की जाती है।

ध्यान करें-सविता शक्ति का किरण पुंज सहस्त्रार चक्र में प्रविष्ट, मस्तिष्क के मध्य में दिव्य आलोक की तरंगें, फुहारें अधिक स्पष्ट, अधिक प्रखर हो रही हैं। वहीं आलोक की तरंगें दूर-दूर तक फैल रही हैं। सर्वत्र आत्मतत्त्व, सर्वत्र अपनी सत्ता की अनुभूति।अद्भुत शांति, तुष्टि, तृप्ति का बोध, पूर्ण-काम, स्थित-प्रज्ञ, अवधूत स्थित का बोध। आत्मसत्ता एवं ब्रह्मसत्ता में अभेद का अनुभव।

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    अनुक्रम

  1. ब्रह्मवर्चस् साधना का उपक्रम
  2. पंचमुखी गायत्री की उच्चस्तरीय साधना का स्वरूप
  3. गायत्री और सावित्री की समन्वित साधना
  4. साधना की क्रम व्यवस्था
  5. पंचकोश जागरण की ध्यान धारणा
  6. कुंडलिनी जागरण की ध्यान धारणा
  7. ध्यान-धारणा का आधार और प्रतिफल
  8. दिव्य-दर्शन का उपाय-अभ्यास
  9. ध्यान भूमिका में प्रवेश
  10. पंचकोशों का स्वरूप
  11. (क) अन्नमय कोश
  12. सविता अवतरण का ध्यान
  13. (ख) प्राणमय कोश
  14. सविता अवतरण का ध्यान
  15. (ग) मनोमय कोश
  16. सविता अवतरण का ध्यान
  17. (घ) विज्ञानमय कोश
  18. सविता अवतरण का ध्यान
  19. (ङ) आनन्दमय कोश
  20. सविता अवतरण का ध्यान
  21. कुंडलिनी के पाँच नाम पाँच स्तर
  22. कुंडलिनी ध्यान-धारणा के पाँच चरण
  23. जागृत जीवन-ज्योति का ऊर्ध्वगमन
  24. चक्र श्रृंखला का वेधन जागरण
  25. आत्मीयता का विस्तार आत्मिक प्रगति का आधार
  26. अंतिम चरण-परिवर्तन
  27. समापन शांति पाठ

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